आईवीएफ (In Vitro Fertilization) एक प्रकार की प्रजनन तकनीक है, जिसे हिंदी में “प्रसूति बाह्य निषेचन” कहा जाता है। यह तकनीक उन दंपतियों के लिए उपयोगी होती है जिन्हें प्राकृतिक तरीके से बच्चे होने में कठिनाई होती है। आईवीएफ की मदद से अंडाणु (ओवम) और शुक्राणु (स्पर्म) को शरीर के बाहर लैब में मिलाकर निषेचन कराया जाता है और फिर विकसित भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है।
आईवीएफ प्रक्रिया के चरण
मूत्रवर्धक दवाओं का सेवन Ovarian Stimulation : महिला को हार्मोनल दवाएं दी जाती हैं ताकि उसके अंडाशय से एक से अधिक अंडाणु विकसित हो सकें। यह दवाएं लगभग 8 से 14 दिन तक ली जाती हैं।
अंडाणु निकालना (Egg Retrieval) : अंडाणु पूरी तरह विकसित होने पर डॉक्टर एक छोटी सुई की मदद से अंडाणु निकालते हैं। यह प्रक्रिया अल्ट्रासाउंड गाइडेड होती है और सामान्यतः हल्की बेहोशी में की जाती है।
शुक्राणु संग्रह (Sperm Collection) : पुरुष से शुक्राणु लिया जाता है। इसे लैब में तैयार किया जाता है ताकि सबसे स्वस्थ और गतिशील शुक्राणु चुने जा सकें।
निषेचन (Fertilization) : अंडाणु और शुक्राणु को लैब में मिलाकर निषेचन कराया जाता है। कुछ मामलों में, डॉक्टर सीधे अंडाणु में एक शुक्राणु डालते हैं, जिसे ICSI (Intracytoplasmic Sperm Injection) आईवीएफ उपचार कहते हैं।
भ्रूण का विकास (Embryo Culture) : निषेचित अंडाणु को कुछ दिनों तक लैब में रखा जाता है ताकि वह भ्रूण में विकसित हो सके।
भ्रूण प्रत्यारोपण (Embryo Transfer) : विकसित भ्रूणों में से चुने गए भ्रूण को महिला के गर्भाशय में डाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद महिला को कुछ समय के लिए आराम करने की सलाह दी जाती है।
गर्भधारण की जांच (Pregnancy Test) : लगभग 10 से 14 दिन बाद, महिला का ब्लड टेस्ट कर गर्भधारण की पुष्टि की जाती है।
आईवीएफ क्यों आवश्यक है?
- महिला में अंडाणु न बनने की समस्या
- पुरुष में शुक्राणु की कमी या गुणवत्ता खराब होना
- बांझपन के अनजान कारण
- फेलोपियन ट्यूब्स की बाधा
- उम्र संबंधी प्रजनन क्षमता में कमी
आईवीएफ से जुड़ी सावधानियां
- प्रक्रिया के दौरान डॉक्टर की सलाह का सख्ती से पालन करें।
- दवाओं का सही समय पर सेवन करें।
- तनाव कम करें और मानसिक रूप से सकारात्मक बने रहें।
- नियमित जांच कराते रहें।
आईवीएफ एक आशा की किरण है उन दंपतियों के लिए जो माता-पिता बनने का सपना पूरा करना चाहते हैं। आधुनिक तकनीक और डॉक्टरों की देखरेख में यह प्रक्रिया सुरक्षित और प्रभावी साबित हो रही है। हालांकि, हर मरीज के लिए परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए धैर्य और सकारात्मक सोच बनाए रखना जरूरी है।



